
Alaska Summit 2025: U.S.–Russia Diplomacy, Geopolitical Shifts, and Future Implication
अमेरिका–रूस अलास्का शिखर सम्मेलन (15 अगस्त 2025)
स्थान: जॉइंट बेस एलमेंडॉर्फ–रिचर्डसन, एंकोरेज, अलास्का
प्रतिभागी: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन
पृष्ठभूमि : Alaska Summit
- ऐतिहासिक संदर्भ
- यह 2007 के बाद पहला ट्रंप–पुतिन शिखर सम्मेलन था जो अमेरिका में आयोजित हुआ।
- प्रतीकात्मक रूप से, यह 1988 के बाद अमेरिका की धरती पर पहला रूस–अमेरिका बैठक थी और 2022 यूक्रेन युद्ध तथा आईसीसी गिरफ्तारी वारंट के बाद पुतिन की किसी पश्चिमी देश की पहली यात्रा थी।
- यह फ़रवरी 2025 के सऊदी अरब वार्ता के बाद हुआ, जहाँ अमेरिका और रूस ने यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के रास्ते तलाशे थे, बिना यूक्रेन और यूरोप की भागीदारी के।
- अलास्का क्यों?
- अलास्का का गहरा प्रतीकात्मक महत्व है: पहले रूसी क्षेत्र के रूप में, भौगोलिक रूप से रूस के निकट, और आईसीसी के अधिकार क्षेत्र से बाहर।
- यह स्थान अमेरिका की आर्कटिक क्षेत्र में रणनीतिक बढ़त को दर्शाता है और पुतिन को उच्च-स्तरीय कूटनीतिक मंच देता है।
- भू-राजनीतिक संदर्भ
- यूक्रेन और यूरोप ने अपनी भागीदारी को नज़रअंदाज़ करने पर आपत्ति जताई, चेतावनी दी कि कीव को बाहर करना पश्चिमी एकता को तोड़ सकता है।
- परमाणु चिंता बढ़ गई जब रूस ने INF संधि से बंधे न रहने की घोषणा की।
- भारत की स्थिति
- भारत ने इस शिखर सम्मेलन का स्वागत सकारात्मक कदम के रूप में किया और पीएम मोदी की पंक्ति दोहराई: “यह युद्ध का युग नहीं है।”
- वार्ता का भारत–अमेरिका व्यापार पर अप्रत्यक्ष प्रभाव था, विशेषकर रूसी तेल आयात से जुड़ी अमेरिकी टैरिफ़ तनातनी के बीच।
शिखर सम्मेलन (Alaska Summit ) का परिणाम
- न युद्धविराम, न समझौता
- लगभग तीन घंटे की वार्ता के बाद कोई युद्धविराम या शांति समझौता नहीं हुआ।
- ट्रंप ने बैठक को “उपयोगी” बताया लेकिन स्पष्ट किया: “जब तक समझौता नहीं होता, तब तक कोई सौदा नहीं है।”
- मुख्य मुद्दे जैसे NATO में यूक्रेन की आकांक्षा, क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा गारंटी अनसुलझे रहे।
- पुतिन की प्रतीकात्मक जीत
- इस शिखर सम्मेलन ने पुतिन का पश्चिमी अलगाव तोड़ा और उन्हें अमेरिकी धरती पर ट्रंप के बराबर दिखाया।
- यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने इसे पुतिन की “व्यक्तिगत जीत” कहा, जिसने कड़े प्रतिबंधों में देरी कर दी और मॉस्को की वैश्विक दृश्यता बढ़ा दी।
- संकेत मिले, लेकिन प्रतिबद्धता नहीं
- खबरों के मुताबिक, पुतिन ने मोर्चे को स्थिर करने और डोनेट्स्क व लुहांस्क में क्षेत्रीय रियायतों के बदले युद्धविराम का सुझाव दिया।
- ट्रंप ने इशारा किया कि यूक्रेन को “समझौता करना होगा” लेकिन रूसी शर्तों का समर्थन नहीं किया।
- यूक्रेन की अनुपस्थिति और यूरोपीय संदेह
- ज़ेलेंस्की को आमंत्रित नहीं किया गया, जिस पर कीव और यूरोपीय राजधानियों ने आलोचना की।
- फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और अन्य ने अमेरिकी पहल का स्वागत किया, लेकिन ज़ोर दिया कि भविष्य की किसी भी वार्ता में यूक्रेन को शामिल करना होगा।
- प्रतीकात्मकता अधिक, ठोस नीति कम
- सम्मेलन में प्रतीकात्मक इशारे (B-2 बॉम्बर फ्लाईओवर, साझा लिमोज़िन सवारी) ज़्यादा दिखे, लेकिन नीति संबंधी कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।
- विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप से अधिक लाभ पुतिन को हुआ, क्योंकि उन्हें वैधता मिली लेकिन कोई रियायत नहीं देनी पड़ी।
भविष्य के निहितार्थ
- आगे की वार्ता का रास्ता
- ट्रंप ने फॉलो-अप मीटिंग का संकेत दिया और कहा कि किसी ठोस प्रस्ताव से पहले वे ज़ेलेंस्की और यूरोपीय सहयोगियों से परामर्श करेंगे।
- पश्चिमी एकता को खतरा
- यूक्रेन को बाहर करना NATO के सिद्धांतों को कमज़ोर करता है और अधिनायकवादी शासन को प्रोत्साहित कर सकता है।
- यूक्रेन की लाल रेखाएँ
- कीव अडिग है: कोई क्षेत्रीय रियायत नहीं, पूर्ण संप्रभुता और विश्वसनीय सुरक्षा गारंटी — जिन्हें अलास्का में संबोधित नहीं किया गया।
- प्रतिबंध और आर्थिक दबाव
- अमेरिकी प्रतिबंध और रूसी तेल खरीदारों पर दबाव अब भी महत्वपूर्ण हथियार बने हुए हैं।
- भू-राजनीतिक संदेश
- पुतिन के लिए: अलगाव खत्म हुआ और वैश्विक शक्ति दलाल की छवि मज़बूत हुई।
- ट्रंप के लिए: चुनौती यह है कि प्रतीकात्मकता को ठोस परिणाम में बदलें, बिना सहयोगियों को नाराज़ किए।
भारत का दृष्टिकोण
- संवाद का स्वागत: भारत ने वार्ता का समर्थन किया, अपनी संतुलित विदेश नीति के अनुरूप।
- रणनीतिक स्वायत्तता: भारत ने वाशिंगटन और मॉस्को दोनों से संबंध बनाए रखकर तटस्थता दर्शाई।
- आर्थिक पहलू: भारत के निर्यात पर 50% अमेरिकी टैरिफ़ लागू हैं, जो रूसी तेल ख़रीद से जुड़े हैं। सम्मेलन की नरमी भविष्य के व्यापार समझौतों को प्रभावित कर सकती है।
वैश्विक प्रभाव–Alaska Summit
- रूस की पुन: प्रविष्टि: सम्मेलन ने पुतिन को कूटनीतिक वैधता दी, जिससे आंशिक रूप से वैश्विक राजनीति में वापसी का संकेत मिला।
- यूरोप का रुख़: यूरोपीय संघ ने दोहराया कि यूक्रेन की संप्रभुता और उसकी भागीदारी अपरिहार्य है।
- कूटनीतिक जोखिम: आलोचकों ने चेतावनी दी कि क्षेत्रीय रियायतों को वैध बनाने से ख़तरनाक मिसाल कायम हो सकती है।
- अधिनायकवादी संकेत: अन्य देश इसे संकेत मान सकते हैं कि केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति ही वैश्विक स्तर पर वैधता दिला सकती है।
सारणी (Summary Table)
पहलू | विवरण |
पृष्ठभूमि | 1988 के बाद पहला अमेरिका–रूस शिखर सम्मेलन अमेरिकी धरती पर; अलास्का का प्रतीकात्मक/भू-राजनीतिक महत्व और ICC क्षेत्राधिकार से बचाव। |
परिणाम | युद्धविराम/समझौता नहीं; पुतिन को वैधता; यूक्रेन बाहर; क्षेत्रीय रियायतों के संकेत, पर कोई प्रतिबद्धता नहीं। |
भारत की स्थिति | वार्ता का स्वागत; संतुलित दृष्टिकोण; रूसी तेल से जुड़े टैरिफ़ तनाव को लेकर सतर्क। |
वैश्विक प्रभाव | पुतिन की कूटनीतिक पुन: प्रविष्टि; यूरोप ने यूक्रेन की संप्रभुता दोहराई; कीव को बाहर करने से जोखिम; अधिनायकवादी देशों को प्रोत्साहन। |
